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जनेऊ ने समाज को बांटा और शुद्र बनाया।*

*जनेऊ ने समाज को बांटा और शुद्र बनाया।*
अमृतलाल सरजीत सिंह
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जातियों को प्राय पेशों के साथ जोड़ कर समझाने का प्रयास किया जाता है। व्यक्ति की नाम से पहचान से पहले उसके पेशे की पहचान होना स्वाभाविक या सामान्य बात है। क्योंकि व्यक्ति का पेशा सीधे तौर पर दिखाई देता है, किंतु व्यक्ति का नाम दिखाई नहीं पड़ता है। इससे पेशों के साथ जातीय नामों की उत्पत्ति भी सामान्य बात है। किंतु प्रश्न है कि पेशों के बदलने से जातियां बदलती क्यों नहीं है? जातियों के नहीं बदले जाने का कारण है जनेऊ व इसके साथ जोड़ दी गई पवित्रता है। जो जनेऊ पहनता है उसे पवित्र माना गया है और जो जनेऊ नहीं पहनता है उसे अपवित्र माना गया है। जो जनेऊ पहनता है उसे सवर्ण माना जाता है और जो जनेऊ नहीं पहनता है उसे अवर्ण माना जाता है अथवा यह कहें कि जिन्हें जनेऊ पहनने का अधिकार दिया गया है वे उच्च सवर्ण है, जो अब स्वयं को हिंदू कहने लगे हैं लेकिन वे वास्तव में बाहर से आए हुए लोग हैं तथा जिन्हें जनेऊ पहनने का अधिकार नहीं है वे अवर्ण हैं, जो देश के मूल निवासी हैं और उच्च सवर्णों द्वारा स्वयं को हिंदू बनाए जाने के बाद इनका एक वर्ग स्वयं को हिंदू कहलाना पसंद नहीं करता है। वैसे भौगोलिक और तात्पर्य परख अर्थों में हिंदू शब्द देश के मूल निवासियों पर ही लागू पड़ता था। सवर्णों ने 1920 के बाद की राजनीतिक चालबाजी के तहत स्वयं को हिंदू कहना शुरू किया है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो जनमत की राजनीति में अलग अलग हो सकते थे।
जैसे देश में अलग-अलग विश्वविद्यालयों द्वारा डिग्री दी जाती है उसी प्रकार जनेऊ भी शिक्षा प्राप्त कर लिए जाने का चिन्ह था। यह जनेऊ चिन्ह ब्राह्मण द्वारा दिया जाता था क्योंकि धर्म व शिक्षण का कार्य करने वाला व्यक्ति ब्राह्मण होता था। प्रारंभ में कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बन सकता था। विश्वामित्र के ब्रह्मर्षि बनने की बात सभी जानते हैं तथा विश्वामित्र व वशिष्ठ के बीच उच्चता के संघर्ष की बात भी सभी जानते हैं। साहित्यिक मिथकों और इतिहास से यह भी स्पष्ट होता है कि जातियां व कर्म जन्मजात नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता तो सुदास, नंद, मौर्य जैसे महाप्रतापी राजा शूद्रों में नहीं होते। लेकिन बाद में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को नीचा बनाए रखने के लिए जनेऊ पहनाना बंद कर दिया। इससे जनेऊ संस्कार पिता द्वारा किया जाना शुरू हो गया और सामाजिक जनेऊ व्यवस्था पैतृक जनेऊ व्यवस्था में बदल गई। कालांतर में क्षत्रियों ने जनेऊ संस्कार को त्याग दिया और आज वे सभी शुद्र वर्ण में गिने जाने लगे हैं क्योंकि जनेऊ से वंचित समुदाय को शूद्र नाम दिया गया था।
पुष्यमित्र शुंग की धार्मिक-राजनीतिक उलटफेर के बाद समाज को पक्के तौर पर वर्ण व्यवस्था आधारित बनाकर चिरस्थाई बनाने का प्रयास हुआ था, वही प्रयास आज तक जारी है और ब्राह्मण वर्ग रामराज्य का सपना संजोए हुए हैं।
यदि मानव सभ्यता विकास की बात को ध्यान में रखकर वर्ण व्यवस्था की बात की जाए तो सर्वप्रथम समाज में केवल एक क्षत्रिय वर्ण ही था जो जानवर मारकर खाता रहा था। इसी ने बाद में कृषि व पशुपालन का काम शुरू किया और वस्तुओं व साधनों के बंटवारे तथा आमोद प्रमोद, परिवार व समाज संबंधी नियम बनाए। ईन्होंने धर्म का रूप लिया और ब्राह्मण वर्ग अस्तित्व में आया। सेवा कार्यों के उद्भव के साथ इन वर्णों में शूद्रों का वर्ण बना। यदि जनेऊ व वर्ण व्यवस्था धार्मिक नहीं होती तो देश अन्य देशों के समाजों की तरह एक समाज बन जाता और भेदभाव में अपनी शक्ति को व्यर्थ गंवाने की बजाय कोई अन्य बेहतर काम करता। व्यक्ति खुद विकसित होता व देश का विकास करता।
काफी अनर्थ हो चुका है, अब भी ब्राह्मण चाहें तो जनेऊ व्यवस्था को त्याग कर व अपना पेशा सभी लोगों के लिए खुला करके एक समग्र समाज का निर्माण कर सकते हैं। जनेऊ को ही सवर्ण-अवर्ण, हिंदू-अहिंदू, अधिकारी- गुलाम आदि की विभाजन रेखा का खुला चिन्ह माना जा सकता है।
हिंदू होना कोई योग्यता का चिन्ह नहीं है और ना ही हिंदू की कोई सर्वमान्य पहचान ही स्वीकृत की गई है। अब तक जनेऊ धारी ब्राह्मण वर्ग स्वयं को हिंदू कहलाने से मना करता रहा है और हिंदू नामक गाली और हिंदुओं पर लगने वाले जजिया टैक्स से भी बचा रहा है। लेकिन अब वह स्वयं को हिंदू कहकर रामराज्य की बात को आगे बढ़ाने लगा है। तो उसे हिंदू बनने देना चाहिए और शेष समाज को अपने पुरखों के बौद्ध धर्म ने लौट जाना चाहिए। इससे वर्ण व्यवस्था, शुद्रता व जातीयता मिटाने के लक्ष्य की प्राप्ति में तेजी आएगी और भारतीय समाज का निर्माण जल्द होगा।
धन्यवाद ।
सबका मंगल हो ।
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अमृतलाल सरजीत सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष इंसाफ
722 6820 310
14 जुलाई 2021
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